Sāṅkhya Yoga

2.4

first review verified; second review pendingArjuna

Sanskrit · Devanagari

अर्जुन उवाच। कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥

Sanskrit · IAST

arjuna uvāca kathaṃ bhīṣmamahaṃ saṅkhye droṇaṃ ca madhusūdana iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvarisūdana

English translation

Kashinath Trimbak Telang, 1882
How, O destroyer of Madhu! shall I encounter with arrows in the battle Bhīṣma and Droṇa —both, O destroyer of enemies! entitled to reverence?

This verse was aligned by machine and has completed first review (google/gemini-3.8-flash confidence: 98%); second review pending. Machine alignment confidence: 63%.

Interpretations

Compare translations and commentaries

All 30 available readings are aligned to this verse. Translations appear first, followed by commentaries; each keeps its author and source trail.

Translation · English

A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Arjuna said: O killer of enemies, O killer of Madhu, how can I counterattack with arrows in battle men like Bhīṣma and Droṇa, who are worthy of my worship?

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 26ed8ef41408…

Read more from A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada →

Translation · English

Abhinavagupta

2.4 See Comment under 2.6

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 7384fd06f989…

Read more from Abhinavagupta →

Translation · English

Dr. S. S. Sankaranarayan

2.4. Arjuna said How shall I with arrows fight in battle against Bhisma and Drona, both being worthy of reverence ? O slayer of Mandhu, O slayer of foes !

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 e0e96c8b5fec…

Read more from Dr. S. S. Sankaranarayan →

Translation · English

Rāmānuja

2.4 - 2.5 Arjuna said Again Arjuna, being moved by love, compassion and fear, mistaking unrighteousness for righteousness, and not understanding, i.e., not knowing the beneficial words of Sri Krsna, said as follows: 'How can I slay Bhisma, Drona and others worthy or reverence? After slaying those elders, though they are intensely attached to enjoyments, how can I enjoy those very pleasures which are now being enjoyed by them? For, it will be mixed with their blood.

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 cf37e9d177de…

Read more from Rāmānuja →

Translation · English

Śaṅkarācārya

2.4 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 d915edd78ed8…

Read more from Śaṅkarācārya →

Translation · English

Shri Purohit Swami

2.4 Arjuna argued: My Lord! How can I, when the battle rages, send an arrow through Bheeshma and Drona, who should receive my reverence?

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 4531bf3fc5df…

Read more from Shri Purohit Swami →

Translation · English

Sir Edwin Arnold

Arjuna. How can I, in the battle, shoot with shafts On Bhishma, or on Drona-O thou Chief!-- Both worshipful, both honourable men?

First model review verified (google/gemini-3.8-flash confidence: 98%); second review pending. SHA-256 a0646d3c5479…

Read more from Sir Edwin Arnold →

Translation · English

Swami Adidevananda

2.4 Arjuna said How can I, O slayer of foes, aim arrows in battle against Bhisma and Drona who are worthy of reverence?

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 934bf1f61f38…

Read more from Swami Adidevananda →

Translation · English

Swami Gambirananda

2.4 Arjuna said O Madhusudana, O destroyer of enemies, how can I fight with arrows in battle against Bhisma and Drona who are worthy of adoration?

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 c4aa76d20772…

Read more from Swami Gambirananda →

Translation · English

Swami Sivananda

2.4 Arjuna said How, O Madhusudana, shall I fight in battle with arrows against Bhishma and Drona, who are fit to be worshipped, O destroyer of enemies?

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 4329d2492120…

Read more from Swami Sivananda →

Translation · Hindi

Śaṅkarācārya

।।2.4।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 223a870c4069…

Read more from Śaṅkarācārya →

Translation · Hindi

Swami Ramsukhdas

।।2.4।। अर्जुन बोले - हे मधुसूदन! मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ? क्योंकि हे अरिसूदन! ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 167fc2edf7e8…

Read more from Swami Ramsukhdas →

Translation · Hindi

Swami Tejomayananda

।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 53f3805de3e6…

Read more from Swami Tejomayananda →

Commentary · English

A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Respectable superiors like Bhīṣma the grandfather and Droṇācārya the teacher are always worshipable. Even if they attack, they should not be counterattacked. It is general etiquette that superiors are not to be offered even a verbal fight. Even if they are sometimes harsh in behavior, they should not be harshly treated. Then, how is it possible for Arjuna to counterattack them? Would Kṛṣṇa ever attack His own grandfather, Ugrasena, or His teacher, Sāndīpani Muni? These were some of the arguments offered by Arjuna to Kṛṣṇa.

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 8cc12099cc3a…

Read more from A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada →

Commentary · English

Swami Sivananda

2.4 कथम् how? भीष्मम् Bhishma? अहम् I? संख्ये in battle? द्रोणम् Drona? च and? मधुसूदन O Madhusudana? इषुभिः with arrows? प्रतियोत्स्यामि shall fight? पूजार्हौ worthy to be worshipped? अरिसूदन O destroyer of enemies.No commentary.

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 1881ef414d99…

Read more from Swami Sivananda →

Commentary · Hindi

Swami Chinmayananda

।।2.4।। अर्जुन का लक्ष्य भ्रष्ट करने वाला कायरतापूर्ण तर्क किसी अविवेकी को ही उचित प्रतीत हो सकता है। अर्जुन के ये तर्क उस व्यक्ति के लिये अर्थशून्य हैं जो मन के संयम को न खोकर परिस्थिति को ठीक प्रकार से समझता है। उसके लिये ऐसी परिस्थितियाँ कोई समस्या नहीं उत्पन्न करतीं। वास्तव में देखा जाय तो यह युद्ध दो व्यक्तियों के मध्य वैयत्तिक वैमनस्य के कारण नहीं हो रहा है। इस समय पाण्डव सैन्य से पृथक् अर्जुन का कोई अस्तित्व नहीं है और न ही भीष्म और द्रोण पृथक् अस्तित्व रखते हैं। वे कौरवों की सेना के ही अंग हैं। किन्हीं सिद्धान्तों के कारण ही ये दोनों सेनायें परस्पर युद्ध के लिये खड़ी हुई हैं। कौरव अधर्म की नीति को अपनाकर युद्ध के लिये तत्पर हैं तो दूसरी ओर पाण्डव हिन्दूशास्त्रों में प्रतिपादित धर्म नीति के लिये युद्धेक्षु हैं।धर्म के श्रेष्ठ पक्ष होने तथा दोनों सेनाओं द्वारा लोकमत की अभिव्यक्ति के कारण अर्जुन को व्यक्तिगत आदर या अनादर अनुभव करने का कोई अधिकार नहीं था और न ही उसे यह अधिकार था कि अधर्म के पक्षधरों में से किसी व्यक्ति विशेष को सम्मान या असम्मान देने के लिये वह आग्रह करे। इस दृष्टिकोण से सम्पूर्ण परिस्थिति को न देखकर अर्जुन स्वयं को एक प्रथक् व्यक्ति समझता है और उसी अहंकारपूर्ण दृष्टिकोण से सम्पूर्ण परिस्थिति को देखता है। अर्जुन अपने आप को द्रोण के शिष्य और भीष्म के पौत्र के रूप में देखता है जबकि गुरु द्रोण और पितामह भीष्म भी अर्जुन को देख रहे थे परन्तु उनके मन में इस प्रकार का कोई भाव नहीं आता है क्याेंकि उन्हांेने अपने व्यक्तित्व को भूलकर अपना सम्पूर्ण तादात्म्य कौरव पक्ष के साथ स्थापित कर लिया था। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का अहंकार ही उसकी मिथ्या धारणाओं और संभ्रम का कारण था।गीता के इस भाग पर मैंने देश के कई प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ विचार विमर्श किया और यह पाया कि वे अर्जुन के तर्क को उचित और न्यायपूर्ण मानते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि यह अत्यन्त सूक्ष्म विषय है जिसका निर्णय होना परम आवश्यक है। संभवत व्यास जी ने यह विचार किया हो कि भावी पीढ़ियों के दिशा निर्देश के लिये इस गुत्थी को हिन्दू तत्त्वज्ञान के द्वारा सुलझाया जाये। जितना ही अधिक होगा तादात्म्य छोटेसे मैं परिच्छिन्न अहंकार के साथ हमारी उतनी ही अधिक समस्यायॆं और संभ्रम हमारे जीवन में आयेंगे। जब यह अहं व्यापक होकर किसी सेना आदर्श राष्ट्र अथवा युग के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तो नैतिक दुर्बलता आदि का क्षय होने लगता है। पूर्ण नैतिक जीवन केवल वही व्यक्ति जी सकता है जिसने अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचान लिया है जो एकमेव अद्वितीय सर्वव्यापी एवं समस्त नाम रूपों में व्याप्त है। आगे हम देखेंगे कि भगवान् श्रीकृष्ण इस सत्य का उपदेश अर्जुन के मानसिक रोग के निवारणार्थ उपचार के रूप में करते हैं।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 7259989733d4…

Read more from Swami Chinmayananda →

Commentary · Hindi

Swami Ramsukhdas

।।2.4।। व्याख्या--'मधुसूदन' और 'अरिसूदन'--ये दो सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि आप दैत्योंको और शत्रुओंको मारनेवाले हैं अर्थात् जो दुष्ट स्वभाववाले, अधर्ममय आचरण करनेवाले और दुनियाको कष्ट देनेवाले मधु-कैटभ आदि दैत्य हैं, उनको भी आपने मारा है; और जो बिना कारण द्वेष रखते हैं, अनिष्ट करते हैं ,ऐसे शत्रुओंको भी आपने मारा है। परन्तु मेरे सामने तो पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण खड़े हैं, जो आचरणोंमें सर्वथा श्रेष्ठ हैं, मेरेपर अत्यधिक स्नेह रखनेवाले हैं और प्यारपूर्वक मेरेको शिक्षा देनेवाले हैं। ऐसे मेरे परम हितैषी दादाजी और विद्यागुरुको मैं कैसे मारूँ?'कथं (टिप्पणी प0 40) भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च'-- मैं कायरताके कारण युद्धसे विमुख नहीं हो रहा हूँ, प्रत्युत धर्मको देखकर युद्धसे विमुख हो रहा हूँ; परन्तु आप कह रहे हैं कि यह कायरता, यह नपुंसकता तुम्हारेमें कहाँसे आ गयी! आप जरा सोचें कि मैं पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ? महाराज! यह मेरी कायरता नहीं है। कायरता तो तब कही जाय, जब मैं मरनेसे डरूँ। मैं मरनेसे नहीं डर रहा हूँ, प्रत्युतमारनेसे डर रहा हूँ।संसारमें दो ही तरहके सम्बन्ध मुख्य हैं--जन्म-सम्बन्ध और विद्या-सम्बन्ध। जन्मके सम्बन्धसे तो पितामह भीष्म हमारे पूजनीय हैं। बचपनसे ही मैं उनकी गोदमें पला हूँ। बचपनमें जब मैं उनको 'पिताजी-पिताजी' कहता, तब वे प्यारसे कहते कि 'मैं तो तेरे पिताका भी पिता हूँ!' इस तरह वे मेरेपर बड़ा ही प्यार, स्नेह रखते आये हैं। विद्याके सम्बन्धसे आचार्य द्रोण हमारे पूजनीय हैं। वे मेरे विद्यागुरु हैं। उनका मेरेपर इतना स्नेह है कि उन्होंने खास अपने पुत्र अश्वत्थामाको भी मेरे समान नहीं पढ़ाया। उन्होंने ब्रह्मास्त्रको चलाना तो दोनोंको सिखाया, पर ब्रह्मास्त्रका उपसंहार करना मेरेको ही सिखाया, अपने पुत्रको नहीं। उन्होंने मेरेको यह वरदान भी दिया है कि 'मेरे शिष्योंमें अस्त्र-शस्त्र-कलामें तुम्हारेसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं होगा।' ऐसे पूजनीय पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके सामने तो वाणीसे 'रे', 'तू'--ऐसा कहना भी उनकी हत्या करनेके समान पाप है, फिर मारनेकी इच्छासे उनके साथ बाणोंसे युद्ध करना कितने भारी पापकी बात है! 'इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हौ'-- सम्बन्धमें बड़े होनेके नाते पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण--ये दोनों ही आदरणीय और पूजनीय हैं। इनका मेरेपर पूरा अधिकार है। अतः ये तो मेरेपर प्रहार कर सकते हैं, पर मैं उनपर बाणोंसे कैसे प्रहार करूँ? उनका प्रतिद्वन्द्वी होकर युद्ध करना तो मेरे लिये बड़े पापकी बात है ! क्योंकि ये दोनों ही मेरेद्वारा सेवा करनेयोग्य हैं और सेवासे भी बढ़कर पूजा करनेयोग्य हैं। ऐसे पूज्यजनोंको मैं बाणोंसे कैसे मारूँ?सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें अर्जुनने उत्तेजित होकर भगवान्से अपना निर्णय कह दिया। अब भगवद्वाणीका असर होनेपर अर्जुन अपने और भगवान्के निर्णयका सन्तुलन करके कहते हैं--

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 bee258ac8c46…

Read more from Swami Ramsukhdas →

Commentary · Sanskrit

Abhinavagupta

।।2.4 2.6।।क्लैव्यादिभिर्निर्भर्त्सनमभिदधत् अधर्मे तव धर्माभिमानोऽयम् (N K (n) omit अयम् S omits the entire sentence) इत्यादि दर्शयति कथमित्यादि। कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च इत्यादिना भुञ्जीय भोगान् इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानं फलविशेषानुसन्धानं च हेयतया पूर्वपक्षे ( N omit पूर्वपक्षे) सूचयति। नैतद्विद्मः इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानमाह। निरनुसन्धानं (S K निरभिसन्धानं) तावत् कर्म नोपपद्यते। न च पराजयमभिसन्धाय युद्धे प्रवर्तते। जयोऽपि नश्चायमनर्थ (S k omit नः) एव। तदाह अहत्वा गुरून् भैक्षमपि चर्तुं श्रेयः। एतच्च निश्चेतुमशक्यं किं जयं कांक्षामः किं वा पराजयम् जयेऽपि बन्धूनां विनाशात्।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 bde3569d74a1…

Read more from Abhinavagupta →

Commentary · Sanskrit

Ānandagiri

।।2.4।।एवं भगवता प्रतिबोध्यमानोऽपि शोकाभिभूतचेतस्त्वादप्रतिबुध्यमानः सन्नर्जुनः स्वाभिप्रायमेव प्रकृतं भगवन्तं प्रत्युक्तवान् कथमित्यादिना। भीष्मं पितामहं द्रोणं चाचार्यं संख्ये रणे हे मधुसूदन इषुभिर्यत्र वाचापि योत्स्यामीति वक्तुमनुचितं तत्र कथं बाणैर्योत्स्ये इति भावः। सायकैस्तौ कथं प्रतियोत्स्यामि प्रतियोत्स्ये तौ हि पूजार्हौ कुसुमादिभिरर्चनयोग्यौ हे अरिसूदन सर्वानेवारीनयत्नेन सूदितवानिति भगवानेवं संबोध्यते।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 03218a5d0d46…

Read more from Ānandagiri →

Commentary · Sanskrit

Dhanapati

।।2.4।। ननु शत्रवस्तापनीया नतु गुरव इत्याशयेनाह कथमिति। भीष्मं पितामहं द्रोणं च धनुर्विद्याचार्यं गुरुं संख्ये संग्रामभूमौ इषुभिः सह कथं प्रतियोत्स्यामि प्रतीपो भूत्वा कथं करिष्यामि। यतः पूजार्हो पूजायोग्यौ भीष्मद्रोणौ। पुष्पादिभिः पूजार्हयोस्तयोरिषुभिर्हननं मया कथं कर्तव्यमित्यर्थः। मधुसूदनारिसूदनेति संबोधयंस्त्वमपि दुष्टानेव तापयसीत्यतो गुरु अदुष्टौ च भीष्मद्रोणौ जहीति प्रेरयितुं नार्हसीति सूचयति। मधुसूदनारिसूदनेति संबोधनद्वयं शोकव्याकुलत्वेन पूर्वापरपरामर्शवैकल्यात्। अतो न मधुसूदनेत्यस्यार्थस्य पुनरुक्तत्वदोष इति केचित्।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 ca6e22ee153e…

Read more from Dhanapati →

Commentary · Sanskrit

Jayatīrtha

।।2.4।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 5f07ca6d123a…

Read more from Jayatīrtha →

Commentary · Sanskrit

Madhusūdana Sarasvatī

।।2.4।।ननु नायं स्वधर्मस्य त्यागः शोकमोहादिवशात् किंतु धर्मत्वाभावादधर्मत्वाच्चास्य युद्धस्य त्यागो मया क्रियत इति भगवदभिप्रायमप्रतिपद्यमानस्यार्जुनस्याभिप्रायमवतारयति भीष्मं पितामहं द्रोणं चाचार्यं संख्ये रणे इषुभिः सायकैः प्रतियोत्स्यामि प्रहरिष्यामि कथम्। न कथंचिदपीत्यर्थः। यतस्तौ पूजार्हौ कुसुमादिभिरर्चनयोग्यौ। पूजार्हाभ्यां सह क्रीडास्थानेऽपि वाचापि हर्षफलकमपि लीलायुद्धमनुचितं किं पुनर्युद्धभूमौ शरैः प्राणत्यागफलकं प्रहरणमित्यर्थः। मधुसूदनारिसूदनेति संबोधनद्वयं शोकव्याकुलत्वेन पूर्वापरपरामर्शवैकल्यात्। अतो न मधुसूदनारिसूदनेत्यस्यार्थस्य पुनरुक्तत्वं दोषः। युद्धमात्रमपि यत्र नोचितं दूरे तत्र वध इति प्रतियोत्स्यामीत्यनेन सूचितम्। अथवा पूजार्हौ कथं प्रतियोत्स्यामि। पूजार्हयोरेव विवरणं भीष्मं द्रोणं चेति। द्वौ ब्राह्मणौ भोजय देवदत्तं यज्ञदत्तं चेतिवत्संबन्धः। अयं भावः दुर्योधनादयो नापुरस्कृत्य भीष्मद्रोणौ युद्धाय सज्जीभवन्ति। तत्र ताभ्यां सह युद्धं न तावद्धर्मः पूजादिवदविहितत्वात्। नचायमनिषिद्धत्वादधर्मोऽपि न भवतीति वाच्यम्।गुरुं हुंकृत्य त्वंकृत्य इत्यादिना शब्दमात्रेणापि गुरुद्रोहो यदानिष्टफलत्वप्रदर्शनेन निषिद्धस्तदा किं वाच्यं ताभ्यां सह संग्रामस्याधर्मत्वे निषिद्धत्वे चेति।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 843a6ec18411…

Read more from Madhusūdana Sarasvatī →

Commentary · Sanskrit

Madhvācārya

।।2.4।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 dd12dcf1460d…

Read more from Madhvācārya →

Commentary · Sanskrit

Nīlakaṇṭha

।।2.4।।ननु शत्रवो वा स्वभावदुष्टा वा तापनीयाः न तु बान्धवाः साधवश्चेत्यर्जुन उवाच कथमिति। मधुसूदनारिसूदनेति संबोधयन् तवापि दुष्टानपि शत्रूनेव तापयतः पूजार्हौ अदुष्टौ गुरू च भीष्मद्रोणौ जहीति वक्तुमयुक्तमिति सूचयति। समानार्थकमिदं संबोधनद्वयं वक्तुः शोकेन विक्लवत्वान्न पौनरुक्त्यदोषावहमित्यन्ये। इषुभिरिति ताभ्यां सह वाचापि योद्धुमशक्यं किमुत बाणैरिति भावः।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 f277327b6ec6…

Read more from Nīlakaṇṭha →

Commentary · Sanskrit

Puruṣottamajī

।।2.4।।एवमुत्तोलकभगवद्वाक्यं श्रुत्वाअहं कातर्येण युद्धान्नापक्रान्तः किन्तु धर्मबुद्ध्या इत्यर्जुनो भगवन्तं विज्ञापयामास कथमित्यादिषड्भिः। हे मधुसूदन मधुदैत्यमारणेन मथुरास्थापनेन भक्तपरिपालक अहं सङ्ख्ये सङ्ग्रामे भीष्मं द्रोणं च इषुभिः शरैः कथं प्रतियोत्स्यामि प्रतिकूलतया योत्स्यामीत्यर्थः। भीष्मस्य भक्तत्वान्मरणमनुचितं द्रोणस्यापि गुरुत्वात्तथेति द्रोणं चेत्यनेन ज्ञापितम्। भीष्मद्रोणौ च पूजार्हौ पूर्वोक्तप्रकारेण। हे अरिसूदन शत्रुमारक अनेन सम्बोधनेनैतौ भक्तद्विजौ नतु शत्रू ततः कथं मारणार्थं मां प्रवर्त्तयसीति ज्ञापितम्।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 67ea605438f5…

Read more from Puruṣottamajī →

Commentary · Sanskrit

Rāmānuja

।।2.4।।अर्जुन उवाच पुनरपि पार्थः स्नेहकारुण्यधर्माधर्मभयाकुलो भगवदुक्तं हिततमम् अजानन् इदम् उवाच। भीष्मद्रोणादिकान् बहुमन्तव्यान् गुरून् कथम् अहं हनिष्यामि कथन्तरां भोगेष्वतिमात्रसक्तान् तान् हत्वा तैः भुज्यमानान् तान् एव भोगान् तद्रुधिरेण उपसिच्य तेषु आसनेषु उपविश्य भुञ्जीय।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 0388b8f38882…

Read more from Rāmānuja →

Commentary · Sanskrit

Śaṅkarācārya

2.4 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 d915edd78ed8…

Read more from Śaṅkarācārya →

Commentary · Sanskrit

Śrīdhara Svāmin

।।2.4।।नाहं कातर्येण शुद्धादुपरतोऽस्मि किंतु युद्धस्यान्याय्यत्वादित्यर्जुन उवाच कथमिति। भीष्मद्रोणौ पूजायामर्हौ योग्यौ तौ प्रति कथमहं योत्स्यामि। तत्रापीषुभिः। यत्र वाचापि योत्स्यामीति वक्तुमनुचितं तत्र बाणैः कथं योत्स्यामीत्यर्थः। हे अरिसूदन शत्रुसूदन।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 9a8532f0660e…

Read more from Śrīdhara Svāmin →

Commentary · Sanskrit

Vallabhācārya

।।2.4।।इति श्रुत्वाऽर्जुनः स्नेहकारुण्यधर्माकुलो भगवद्वाक्यं सम्यगजानन्नाह कथमिति। अरिसूदनेति शत्रुमारणे त्वयाऽपि क्वचिन्नैवं कृतमिति सम्बोधयति।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 5bebd847320a…

Read more from Vallabhācārya →

Commentary · Sanskrit

Vedānta Deśika Veṅkaṭanātha

।।2.4।।अथ भगवदुक्तयुद्धारम्भस्य परम्परया परमनिश्श्रेयसहेतुत्वरूपहिततमत्वाज्ञानात् तत्प्रतिक्षेपरूपस्यार्जुनवाक्यस्योत्थानं तथाविधाज्ञानस्य चास्थानस्नेहाद्याकुलतामूलत्वं वदन्नुत्तरमवतारयति पुनरपीति। उक्तार्थविषयतयापुनरपीदमुवाचेत्युक्तम्।कथम् इत्यादिश्लोके चकारस्यानुक्तसमुच्चयार्थत्वप्रदर्शनायआदिशब्दः उपात्तस्यानुपात्तोपलक्षणतया वा। पूजार्हशब्दविवक्षितबहुमन्तव्यत्वहेतुतयोत्तरश्लोकस्थमत्राकृष्योक्तंगुरूनिति।बहुमन्तव्यानिति महानुभावान् इत्युत्तरश्लोकस्थानुसन्धानाद्वा ते स्वत एव बहुमन्तव्याः। पितामहत्वधनुर्वेदाचार्यत्वादिभिरत्यन्तबहुमन्तव्या इति भावः। पुष्पादिभिः पूजार्हाणां पूजादिनिवृत्तिरेव साहसम् हननं त्वतिसाहसम् गुरुभक्त्या च तद्विरोधिभिः सह योद्धव्यम् न पुनर्गुरुभिरितिकथं गुरूनिषुभिः प्रतियोत्स्यामि इत्यस्य भावः।अहंशब्देन प्रख्यातवंशत्वादिकमभिप्रेतम्।इषुभिः प्रतियोत्स्यामि इत्यस्य हननपर्यन्तप्रतियुद्धाभिप्रायत्वमुत्तरश्लोकेन विवृतमितिहनिष्यामीत्युक्तम्। मधुसूदनारिसूदनशब्दाभ्यां नहि त्वमपि सान्दीपिन्यादिसूदन इति सूचितम्।चर्तुम् इत्यत्र भावमात्रार्थस्तुमुन् न तु क्रियार्थोपपदिकः। यद्यपि या काचिज्जीविकाऽऽश्रयणीया तथापि गुरुवधलब्धभोगेभ्य इह लोके परधर्मरूपभैक्षाचरणमपि श्रेयः प्रशस्यतरम्। महाप्रभावगुरुवधसाध्यपारलौकिकदुःखस्यातिमहत्त्वादिति भावः। प्रकृतविरुद्धार्थत्वभ्रमव्युदासायपूर्वश्लोकस्थकथंशब्दानुषङ्गादतिनृशंसत्वसामर्थ्यात् तुशब्दद्योतितवैषम्याच्चकथन्तराम् इत्युक्तम्।गर्हायां ल़डपिजात्वोः अष्टा.3।3।142विभाषा कथमि लिङ् च अष्टा.3।3।143 इति गर्हार्थ इह लिङ्प्रत्ययः। अत्रअर्थकामान् इत्यत्र द्वन्द्वादिभ्रान्तिनिवर्तनाय समासतदंशद्वयार्थोभोगेष्वतिमात्रप्रसक्तान् इत्युक्तः। अर्थेषु कामो येषामिति विग्रहःअवर्ज्यो हि व्यधिकरणो बहुव्रीहिर्जन्माद्युत्तरपदः। अर्थ्यन्त इत्यर्था भोगाः कामश्चातिमात्रसङ्गो वक्ष्यते। यद्वा अर्थं कामयन्त इत्यर्थकामाः ते निष्कामाश्चेत् तद्भोगहरणमपि सह्येत इदं तु क्षुधितानामोदनहरणवदिति भावः। हननादप्यतिनृशंसत्वसूचनायभोगरुधिरादिशब्दैरर्थसिद्धिः।तुशब्देन च द्योतितो विशेषस्तैरित्यादिना उक्तः।इहैव इत्यनेन विवक्षितोनृशंसत्वातिशयस्तेषु इत्यादिना दर्शितः। गुरुवधसाध्यभोगा रुधिरप्रदिग्धगुरुस्मृतिहेतुत्वात् स्वयमपि तथाविधा इव दुर्भोजा भवन्तीत्यैहलौकिकसुखमपि नास्तीति रुधिरप्रदिग्धशब्दाभिप्राय इत्याह तद्रुधिरेणोपसिच्येति। उपसेचनं हि स्वयमद्यमानं सदन्यस्यादनहेतुः इह तदुभयमपि विपरीतमिति भावः।

Machine-validated alignment; human review pending. SHA-256 5642eb61142d…

Read more from Vedānta Deśika Veṅkaṭanātha →

Each reading retains its source-specific rights and alignment review record. Sources and rights →

Source trail

Trace this verse

Canonical ID
gita.2.4
Corpus version
gita-1.0.0-rc.1
Text review
machine-cross-checked; first review verified, second pass pending
Devanagari and IAST digital witness
vedic-scriptures · BG2.4
English translation witness
telang-1882 · Chapter 2; aligned against BG2.4
SHA-256
859307bb699afafa1a68a8444f74b7d8491141c908bea164959d9c5d508c807f