Viśvarūpa Darśana Yoga

11.16

first review verified; second review pendingArjuna

Sanskrit · Devanagari

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥

Sanskrit · IAST

anekabāhūdaravaktranetraṃ paśyāmi tvāṃ sarvato.anantarūpam nāntaṃ na madhyaṃ na punastavādiṃ paśyāmi viśveśvara viśvarūpa

English translation

Kashinath Trimbak Telang, 1882
I see you, who are of countless forms, possessed of many arms, stomachs, mouths, and eyes on all sides. And, O lord of the universe! O you of all forms!

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Interpretations

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Translation · English

A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

O Lord of the universe, O universal form, I see in Your body many, many arms, bellies, mouths and eyes, expanded everywhere, without limit. I see in You no end, no middle and no beginning.

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Translation · English

Abhinavagupta

11.16 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.

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Dr. S. S. Sankaranarayan

11.16. I behold You of many arms, bellies, mouths and eyes and of infinite forms on all sides; of You, I find neither the end, nor the centre, nor the beginnng too, O Lord of the universe, O Universal-formed One !

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Rāmānuja

11.16 I behold Your infinite form on all sides with many arms, stomachs, mouths and eyes. O Lord of the universe, namely, the controller of the universe, O Universal Form having the universe as Your body! As You are infinite, therefore, I see no end, no middle and no beginning for You.

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Śaṅkarācārya

11.16 Pasyami, I see; tvam, You; aneka-bahu-udara-vaktra-netram, as possessed of numerous arms, bellies, mouths and eyes; ananta-rupam, having infinite forms; sarvatah, all around. Visveswara, O Lord of the Universe; visva-rupa, O Cosmic Person; na pasyami, I see not; ['I do not see-because of Your all-pervasiveness.'] tava, Your; antam, end; na madhyam, nor the middle-what lies between two extremities; na punah, nor again; the adim, beginning-I see not the limit (end) nor the middle, nor again the beginning, of You who are God! Furthermore,

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Translation · English

Shri Purohit Swami

11.16 I see Thee, infinite in form, with, as it were, faces, eyes and limbs everywhere; no beginning, no middle, no end; O Thou Lord of the Universe, Whose Form is universal!

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Translation · English

Sir Edwin Arnold

Yea! mightiest Lord! I see Thy thousand thousand arms, and breasts, and faces, And eyes,--on every side Perfect, diversified; And nowhere end of Thee, nowhere beginning, Nowhere a centre! Shifts-- Wherever soul's gaze lifts-- Thy central Self, all-wielding, and all-winning!

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Translation · English

Swami Adidevananda

11.16 With manifold arms, stomachs, mouths and eyes, I behold Your infinite form on all sides. I see no end, no middle nor the beginning too of You, O Lord of the universe, O You of Universal Form.

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Translation · English

Swami Gambirananda

11.16 I see You as possessed of numerous arms, bellies, mouths and eyes; as having infinite forms all around. O Lord of the Universe, O Cosmic Person, I see not Your limit nor the middle, nor again the beginning!

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Translation · English

Swami Sivananda

11.16 I see Thee of boundless form on every side with many arms, stomachs, mouths and eyes: neither the end nor the middle nor also the beginning do I see, O Lord of the universe, O Cosmic Form.

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Translation · Hindi

Śaṅkarācārya

।।11.16।।मैं आपको अनेकों भुजा? उदर? मुख और नेत्रोंवाला अर्थात् आपके जिस स्वरूपमें अनेकों भुजा? उदर? मुख और नेत्र हैं ऐसे रूपवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपवाला अर्थात् जिसके सर्वत्र अनन्त रूप हैं ऐसा? देख रहा हूँ। हे विश्वेश्वर हे विश्वरूप मैं आपका न तो अन्त अर्थात् समाप्ति? न मध्य अर्थात् आदि और अन्तके बीचकी अवस्था और न आदि ही देखता हूँ? अभिप्राय यह कि मुझे आप परमात्मदेवका न अन्त दिखलायी देता है? न मध्य दीखता है और न आपका आदि ही दिखलायी देता है।

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Translation · Hindi

Swami Ramsukhdas

।।11.16।। हे विश्वरूप ! हे विश्वेश्वरव ! आपको मैं अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ। मैं आपके न आदिको, न मध्यको और न अन्तको ही देख रहा हूँ।

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Translation · Hindi

Swami Tejomayananda

।।11.16।। हे विश्वेश्वर! मैं आपकी अनेक बाहु, उदर, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ और न मध्य को और न आदि को।।

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Commentary · English

A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Kṛṣṇa is the Supreme Personality of Godhead and is unlimited; thus through Him everything could be seen.

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Commentary · English

Swami Sivananda

11.16 अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् with manifold arms? stomachs? mouths and eyes? पश्यामि (I) see? त्वाम् Thee? सर्वतः on every side? अनन्तरूपम् of boundless form? न not? अनत्म् end? न not? मध्यम् middle? न not? पुनः,again? तव Thy? आदिम् origin? पश्यामि (I) see? विश्वेश्वर O Lord of the universe? विश्वरूप O Cosmic Form.Commentary A thing that is limited by space and time has a begining? a middle and an end? but the Lord is omnipresent and eternal. He exists in the three periods of time -- past? present and future? but is not limited by time and space. Therefore He has neither a beginning nor middle nor end.Arjuna could have this divine vision only with the help of the divine eye bestowed upon him by the Lord. He who has supreme devotion to the Lord and on whom the Lord showers His grace can enjoy this wondrous vision.

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Commentary · Hindi

Swami Chinmayananda

।।11.16।। विश्वरूप के अनन्त वैभव को एक ही दृष्टिक्षेप में देख पाने के लिए मानव की परिच्छिन्न बुद्धि उपयुक्त साधन नहीं है। इस रूप के परिमाण की विशालता और उसके गूढ़ अभिप्राय से ही मनुष्य की? बुद्धि निश्चय ही? लड़खड़ाकर रह जाती है। भगवान् ही वह एकमेव सत्य तत्त्व हैं जो सभी प्राणियों की कर्मेन्द्रियों के पीछे चैतन्य रूप से विद्यमान हैं। अर्जुन इसे इन शब्दों में सूचित करता है कि मैं आपको अनेक बाहु? उदर? मुख और नेत्रों से युक्त सर्वत्र अनन्तरूप में देखता हूँ। इसे सत्य का व्यंग्यचित्र नहीं समझ लेना चाहिये। सावधानी की सूचना उन शीघ्रता में काम आने वाले चित्रकारों के लिए आवश्यक है? जो इस विषयवस्तु से स्फूर्ति और प्रेरणा पाकर इस विराट् रूप को अपने रंगों और तूलिका के द्वारा चित्रित करना चाहते हैं और अपने प्रयत्न में अत्यन्त दयनीय रूप से असफल होते हैं।विश्व की एकता कोई दृष्टिगोचर वस्तु नहीं है यह साक्षात्कार के योग्य एक सत्य तथ्य है। इस तथ्य की पुष्टि अर्जुन के इन शब्दों से होती है कि मैं न आपके अन्त को देखता हूँ? और न मध्य को और न आदि को। विराट् पुरुष का वर्णन इससे और अधिक अच्छे प्रकार से नहीं किया जा सकता था।उपर्युक्त ये श्लोक सभी परिच्छिन्न वस्तुओं के और मरणशील प्राणियों में सूत्र रूप से व्याप्त उस एकत्व का दर्शन कराते हैं? जिसने उन्हें इस विश्वरूपी माला के रूप मे धारण किया हुआ हैअर्जुन आगे कहता है

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Commentary · Hindi

Swami Ramsukhdas

।।11.16।। व्याख्या--'विश्वरूप',विश्वेश्वर'--इन दो सम्बोधनोंका तात्पर्य है कि मेरेको जो कुछ भी दीख रहा है, वह सब आप ही हैं और इस विश्वके मालिक भी आप ही हैं। सांसारिक मनुष्योंके शरीर तो जड होते हैं और उनमें शरीरी चेतन होता है; परन्तु आपके विराट्रूपमें शरीर और शरीरी-- ये दो विभाग नहीं हैं। विराट्रूपमें शरीर और शरीरीरूपसे एक आप ही हैं। इसलिये विराट्रूपमें सब कुछ चिन्मय-ही-चिन्मय है। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुन विश्वरूप सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीर हैं और 'विश्वेश्वर' सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीरी (शरीरके मालिक) हैं। 'अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्'--मैं आपके हाथोंकी तरफ देखता हूँ तो आपके हाथ भी अनेक हैं; आपके पेटकी तरफ देखता हूँ तो पेट भी अनेक हैं; आपके मुखकी तरफ देखता हूँ तो मुख भी अनेक हैं; और आपके नेत्रोंकी तरफ देखता हूँ तो नेत्र भी अनेक हैं। तात्पर्य है कि आपके हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंका कोई,अन्त नहीं है, सब-के-सब अनन्त हैं। 'पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्'--आप देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिके रूपमें चारों तरफ अनन्त-ही-अनन्त दिखायी दे रहे हैं।'नान्तं न मध्यं पुनस्तवादिम्'--आपका कहाँ अन्त है, इसका भी पता नहीं; आपका कहाँ मध्य है, इसका भी पता नहीं और आपका कहाँ आदि है, इसका भी पता नहीं।सबसे पहले 'नान्तम्' कहनेका तात्पर्य यह मालूम देता है कि जब कोई किसीको देखता है, तब सबसे पहले उसकी दृष्टि उस वस्तुकी सीमापर जाती है कि यह कहाँतक है। जैसे, किसी पुस्तकको देखनेपर सबसे पहले उसकी सीमापर दृष्टि जाती है कि पुस्तककी लम्बाई-चौड़ाई कितनी है। ऐसे ही भगवान्के विराट्रूपको देखनेपर अर्जुनकी दृष्टि सबसे पहले उसकी सीमा-(अन्त-) की ओर गयी। जब अर्जुनको उसका अन्त नहीं देखा, तब उनकी दृष्टि मध्यभागपर गयी फिर आदि-(आरम्भ-) की तरफ दृष्टि गयी; पर कहीं भी विराट्स्वरूपका अन्त, मध्य और आदिका पता नहीं लगा। इसलिये इस श्लोकमें 'नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्' -- यह क्रम रखा गया है।

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Commentary · Sanskrit

Abhinavagupta

।।11.16।।No commentary.

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Commentary · Sanskrit

Ānandagiri

।।11.16।।यत्र भगवद्देहे सर्वमिदं दृष्टं तमेव विशिनष्टि -- अनेकेति। आदिशब्देन मूलमुच्यते। नान्तं न मध्यमित्यत्रापि पश्यामीत्यस्य प्रत्येकं संबन्धं सूचयति -- नान्तं पश्यामीति।

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Commentary · Sanskrit

Dhanapati

।।11.16।।यस्य देहे सर्वं दृष्टं तं देहवन्तं विशिनष्टि। अनेकानि बाह्वदीनि यस्य तं त्वां? सर्वत्रानन्तानि रुपाण्यस्येति तं पश्यामि। तवादिमन्तं मध्यं पुनर्न पश्यामि विश्वदर्शनं तव देहे युक्तं विश्वरुपत्वात्तवेति सूचनार्थम्। हे विश्वरुपेतिसंबोधनम्। विश्वस्याद्यन्तमध्यवत्त्वेऽपि तव तद्वत्त्वं नास्ति विश्वरुपत्वेऽपि विश्वेश्वरत्वात्तवेति द्योतनार्थ विश्वेश्वरेति संबोधनम्।

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Commentary · Sanskrit

Jayatīrtha

।।11.16।।अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं इत्यत्रानेकशब्दस्य द्व्यादौ पर्यवसानात् विवक्षितमर्थमाह -- अनेकेति। अनेनानेकवक्त्रनयनमित्यपि व्याख्यातम्। कुत एतत् इत्यत आह -- अनन्तेति।सर्वत इत्यस्यार्थस्तात्पर्यनिर्णयेऽवगन्तव्यः इत्यादि च वक्ष्यति। बाहुभ्यां प्रधानाभ्यां? पतत्त्रैः पतत्त्रसदृशैरितरबाहुभिः? सन्धमति अग्न्यादिभूतानि संयोजयतीति प्रत्येकमन्वयः। सन्नमतीत्यस्याप्ययमेवार्थः। एतयोर्मन्त्रयोः प्रकृतानुपयोगादयुक्तमुदाहरणमित्यत आह -- विश्वशब्दश्चेति। तथा च प्रथमार्थे तसिरित्युक्तं भवति। स्पष्टार्थो चात्र श्रुतिमाह -- अनन्तबाहुमिति। यदि भगवाननन्तबाह्वादिस्तद्य परममहत्परिमाणः स्यात्। अन्यथा तदयोगात्। न च तद्युक्तम्।रूपं महत्ते [11।23] इति महत्त्वमात्रोक्तेः। तथाबहुवक्त्रनेत्र [11।23] इति बहुत्वमात्रोक्तेरनन्तबाह्वादित्वोक्तिश्चानुपपन्नेत्यत आह -- महत्त्वादिति। स्यादयं विरोधो यदि भगवद्रूपस्य महत्त्वमात्रं तदवयवानां च बहुत्वमात्रमुच्येत्। न चैवम्? अवच्छेदकाश्रवणात्। महत्त्वबहुत्वोक्तिस्तु परममहत्त्वात्मकत्वेनानन्तावयत्वेन च सह सम्भवति। परममहति महत्त्वस्यानन्ते बहुत्वस्यान्तर्भावादित्यर्थः।अवच्छेदकानुक्तावप्यवान्तरमहत्त्वादिग्रहणे को दोषः इत्यत आह -- अन्यथेति। तत्र परममहत्त्वस्यानन्तावयवत्वस्य चोक्तेरिति भावः।पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपंत्वया ततं विश्वमनन्तरूप [11।38] इत्यनन्तशब्दद्वयस्य माहात्म्यातिशयसूचनायार्थभेदमाह -- एकत्र त्विति। अपरिमाणोऽपरिच्छिन्न इत्यनन्तरूप इति सम्बन्धः। स्यादिदं व्याख्यानं यदीदं द्वयं प्रामाणिकं स्यादित्यत आह -- उक्तं हीति। महान्तं महत्।महतो महान्तं इत्यनन्तमपरिच्छिन्नपरिमाणं रूपमस्येत्युक्तार्थे प्रमाणम्। एकं भिन्नमपि अनन्तरूपमित्यनन्तसङ्ख्यान्यस्य रूपाणीत्यत्र। ननुमहतो महान्तं इति महत्तत्त्वान्महत्त्वमेवोच्यते? न त्वन्तत्वम्। ततश्चयदेकमव्यक्तं इत्यव्यक्तव्यापित्ववचनात्तत्साम्यमेव सिध्यतीत्यत आह -- अव्यक्तस्येति। महतो महत्त्वेऽव्यक्तव्यापित्वे चेत्यपि ग्राह्यम्। अव्यक्तस्यानन्तत्वं कुतः इत्यत आह -- महान्तं चेति। अनन्तस्य विष्णोः प्रतिमाभूतस्य तस्यान्तः परिमाणं परिच्छेदः? कार्यतः सङ्ख्यानं सङ्ख्यापरिच्छेदोऽपि न विद्यते। प्रकारान्तरेणानन्तरूपशब्दद्वयस्यार्थभेदमाह -- तानि चेति। एकस्यानन्तरूपशब्दस्यानन्तसङ्ख्यारूपार्थत्वे स्थिते सत्येकत्रानन्तरूपशब्दे तानि चानन्तसङ्ख्यानि रूपाणि प्रत्येकमपरिच्छिन्नपरिमाणानीत्यर्थो भवतीत्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह -- असङ्ख्याता इति। ज्ञानकाः ज्ञानानन्दात्मकाः। अयं बहिर्व्याप्त आकाशः परमात्मा यावान् यावत्परिमाणस्तावानेवैषोऽन्तर्हृदये स्थितः परमात्मेत्यर्थः। गर्भे जठरे जगद्यस्यासौ तथोक्तः। अवसन्नोऽवनतः। गर्भजगत्त्वेनापरिच्छिन्नपरिमाणत्वं लभ्यते। कृष्णादीनामप्यपरिच्छिन्नपरिमाणत्वं वदन्तो वक्तव्याः। तत्राल्पपरिमाणप्रतीतिर्या सा किं भ्रान्तिरुत प्रमितिः इति। आद्ये क्रियादेर्द्विभुजचतुर्भुजादेश्च मिथ्यात्वं स्यात्। न द्वितीयः? युगपदेकत्राल्पानल्पपरिमाणसमावेशस्यायुक्तत्वात्। अतोऽपरिच्छिन्नपरिमाणोक्तिरुपचारमात्रमिति चेत्? किमिदमनेकपरिमाणत्वस्यायुक्तत्वं किमन्यत्रादर्शनेनासम्भावितत्वम् उत नायमल्पानल्पपरिमाणोपेतो द्रव्यत्वात्। नायं परममहत्परिमाणः? अल्पपरिमाणत्वात् पटवदित्यादियुक्तिविरुद्धत्वम्।अथातिप्रसङ्गदुष्टत्वं किंवाऽप्रामाणिकत्वम् नाद्य इत्याह -- न चेति। अघटितघटनाशक्त्युपेते किं नामासम्भावितमिति भावः। न द्वितीयः? ईश्वरस्य युक्त्यगोचरत्वेन तदनवकाशादिति भावेनाह -- अचिन्त्या इति। एषा ब्रह्मविषया। अपनेया निराकार्या। अतिप्रसङ्गोऽपि किं यदीश्वरो विरुद्धपरिमाणद्वयोपेतः स्यात् तदा निर्दुःखो दुःखी स्यादितीश्वरमधिकृत्य स्यात् उत प्राणादयोऽपि तथा स्युः तथा चाणुश्चेत्यादिका तद्विषयवाक्यव्यवस्था नाङ्गीक्रियेतेत्यन्यदधिकृत्य स्यात्। आद्यं दूषयति -- अतिप्रसङ्गस्त्विति। अविशेषमाश्रित्य ह्ययमतिप्रसङ्गः? नचासावस्ति निर्दोषानन्तगुणत्वे हरेः श्रुतीनां महातात्पर्येण दुःखादेस्तद्विरोधात्? परिमाणद्वयस्य तु तदविरोधात्? दुःखादेरप्रामाणिकत्वात्? परिमाणद्वयस्य तूक्तवक्ष्यमाणवाक्यसिद्धत्वादिति भावः। विपर्ययापर्यवसायी चायं प्रसङ्ग इति भावेनाह -- न हीति। यदि घटः पृथुबुध्नोदराकारः स्यात्तर्हि पदार्थो न स्यात् तथाविधस्य पदार्थस्य कस्याप्यदृष्टत्वादिति प्रसङ्गो यथा न युक्तः? भवति च पदार्थस्तस्मात्पृथुबुध्नोदराकारः? न भवतीति विपर्ययस्य प्रमाणबाधितत्वेनापर्यवसानात्? तथात्वेन तस्य धर्मिग्राहकप्रमाणदृष्टत्वात्। तथा प्रकृतेऽपीति। एतेनानुमानानां कालात्ययापदिष्टत्वं चोक्तं भवति। प्राणादिकमधिकृत्यातिप्रसङ्ग इति द्वितीयं निराकरोति -- केषुचिदिति। अत्रापि सम्भावनाहेतुभावाभावाभ्यां विशेषादविशेषोऽसिद्ध इति भावः।चतुर्थं निरस्यति -- गुणा इति। श्रुता अश्रुता अपि सुविरुद्धा अन्यत्र सहादृष्टा अविरुद्धाश्च। तथा गुणा इव दोषाः श्रुता अश्रुताश्च नैव सन्ति? किन्त्वज्ञैर्मिथ्यादृष्टिभिर्हि तथा सन्तीति प्रतीताः। एवं परे ईश्वरे स्थितिः? ततोऽन्यत्र तु श्रुतानां प्रमाणान्तरसिद्धानां च गुणदोषाणां व्यवस्थावस्थानम्। तच्च क्रमादुत्तमेषु गुणबाहुल्यं दोषाल्पत्वं? मध्यमेषूभयसाम्यम्? अवरेषु दोषबाहुल्यं गुणाल्पत्वमिति। तदेवमसम्भावनाद्यभावान्न भगवति अपरिच्छिन्नपरिमाणत्वोक्तेरुपचरितत्वं कल्प्यम्। अर्जुनेनापि तन्निराकृतमिति भावेनाह -- उपचारत्वेति।नान्तं न पुनस्तवादिं पश्यामि इत्याद्यन्ताभावोक्तेरुपचरितत्वपरिहाराय न मध्यमित्युक्तम्। मध्यनिराकरणार्थमेव तत्किं न स्यात् इत्यत आह -- अन्यथेति। उपचारत्वपरिहारार्थत्वाभावे तद्वैयर्थ्यं स्यादिति शेषः। कुतः आद्यन्तसापेक्षत्वात् मध्यस्य तदभावोक्त्यैव तदभावसिद्धेः। विश्वं महदादिकं रूपं स्वरूपमस्येति प्रतीतिं सप्रमाणकं निवायरति -- विश्वरूप इति। एतच्चाभ्यासरूपमिति मन्तव्यम्।

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Commentary · Sanskrit

Madhusūdana Sarasvatī

।।11.16।।यत्र भगवद्देहे सर्वमिदं दृष्टवान् तमेव विशिनष्टि -- अनेकेति। बाहव उदराणि वक्त्राणि नेत्राणि चानेकानि यस्य तमनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतः सर्वत्र। अनन्तानि रूपाणि यस्येति तम्। तव तु पुनर्नान्तमवसानं न मध्यं नाप्यादिं पश्यामि सर्वगतत्वात्। हे विश्वेश्वर हे विश्वरूप। संबोधनद्वयमतिसंभ्रमात्।

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Commentary · Sanskrit

Madhvācārya

।।11.16।।अनेकशब्दोऽनन्तवाची?अनन्तबाहुं [11।19] इति स्वयं वक्ष्यतिसर्वतः पाणिपादं तत् इत्यादि च। विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्त्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः [ऋक्सं.2।2।4।24म.ना.2।2श्वे.उ.3।3] इति ऋग्वेदखिलेषु। विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्यात्। सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्त्रद्यौर्वाभूमी जनयन्देव एकः इति यजुर्वेदे च। विश्वशब्दश्चानन्तवाची।सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्ण(र्व)मेव च इत्यभिधानात्। अनन्तबाहुमनन्तपादमनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् इति च (सामवेदस्य) बाभ्रव्यशाखायाम्। महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति।अन्यथाअनादिमत्परं ब्रह्म [13।12] इत्याद्ययुक्तं स्यात्। एकत्र त्वनन्तान्यस्य रूपाणीत्यनन्तरूपः। अन्यत्र त्वपरिमाण इति। उक्तं ह्युभयमपि -- परात्परं यन्महतो महान्तं यदेकमव्यक्तमनन्तरूपम् इति यजुर्वेदे। अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वे अपरिमितत्वं सिध्यति।महान्तं च समावृत्य प्रधानं समव(समुप)स्थितम्। अनन्तस्य न तस्यान्तस्सङ्ख्यानं चापि विद्यते इत्यादित्यपुराणे। तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवति। असंख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परिमाणविवर्जिताश्च इत्यृग्वेदखिलेषु। यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते। उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ [छा.उ.8।1।3] इति च।कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नं पार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम्,[10।16।31] इति च भागवते।न चैतदयुक्तम्? अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य।अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् इति च श्रीविष्णुपुराणे [ ]। नैषा तर्केण मतिरापनेया [कठो.2।9] इति श्रुतिः। अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशात् वाक्यबलाच्चापनेयः। न हि घटवत्कश्चित्पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन्निराक्रियते। केषुचित्पदार्थेषु वाक्यव्यवस्था अचिन्त्यशीकृत्वा भावादङ्गीक्रियते।गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का। चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः। एवं परेऽन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद्व्यवस्था इति जाबालिखिले श्रुतेश्च। उपचारत्वपरिहाराय न मध्यमिति। अन्यथा आद्यन्तभावेनैव तत्सिद्धेः। विश्वरूपः पूर्णरूपः स विश्वरूपो अनूनरूपो अतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य इति शाण्डिल्यशाखायाम्।

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Commentary · Sanskrit

Nīlakaṇṭha

।।11.16।।अनेके अनन्ता बाहव उदराणि वक्त्राणि नेत्राणि च यस्मिंस्तदनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्। सर्वतश्चतुर्दिक्षूपर्यधश्चानन्तमपरिच्छिन्नं रूपमस्य तम्। अनन्तत्वमेवाह -- नान्तमिति। दीर्घरज्ज्वा इव तवाद्यन्तौ दैशिकौ न स्त इत्यर्थः।

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Commentary · Sanskrit

Puruṣottamajī

।।11.16।।यस्य देहे न एतान् पश्यामि तादृशं त्वां च पश्यामीत्याह भ्रमाभावाय -- अनेकेति। अनेकानि बाह्वादीनि यस्य। सर्वतोऽनन्तानि रूपाणि यस्यैतादृशं त्वां पश्यामि। तादृशानेकरूपस्यापि तव अन्तं पूर्णभावं?,मध्यं स्थितिस्थानम्? आदिमुत्पत्तिस्थानं न पश्यामि। विश्वेश्वर विश्वपरिपालक किं बहुना विश्वरूपं पश्यामि।

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Commentary · Sanskrit

Rāmānuja

।।11.16।।अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् अनन्तरूपं त्वां सर्वतः पश्यामि। विश्वेश्वर विश्वस्त नियन्तः विश्वरूप विश्वशरीर यतः त्वम् अनन्तः? अतः तव न अन्तं न मध्यं न पुनः तव आदिं च पश्यामि।

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Commentary · Sanskrit

Śaṅkarācārya

।।11.16।। --,अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् अनेके बाहवः उदराणि वक्त्राणि नेत्राणि च यस्य तव सः त्वम् अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रः तम् अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्। पश्यामि त्वा त्वां सर्वतः सर्वत्र अनन्तरूपम् अनन्तानि रूपाणि अस्य इति अनन्तरूपः तम् अनन्तरूपम्।,न अन्तम्? अन्तः अवसानम्? न मध्यम्? मध्यं नाम द्वयोः कोट्योः अन्तरम्? न पुनः तव आदिम् -- न देवस्य अन्तं पश्यामि? न मध्यं पश्यामि? न पुनः आदिं पश्यामि? हे विश्वेश्वर विश्वरूप।।किञ्च --,

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Commentary · Sanskrit

Śrīdhara Svāmin

।।11.16।। किंच -- अनेकेति। अनेकानि बाह्वादीनि यस्य तादृशं पश्यामि। अनन्तानि रूपाणि यस्य तं त्वां सर्वतः पश्यामि। तव तु अन्तं मध्यमादिं च न पश्यामि सर्वगतत्वात्।

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Commentary · Sanskrit

Vallabhācārya

।।11.16।।अनेकेति। कूटस्थत्वात्।

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Commentary · Sanskrit

Vedānta Deśika Veṅkaṭanātha

।।11.16।।सर्वतोऽनन्तरूपम् इत्यन्वयेसर्वतः इति शब्दस्य वैय्यर्थ्यं स्यात्सर्वतः पश्यामि इत्यन्वयस्तु दिव्यचक्षुर्लाभानुगुणत्वाद्युक्तः। विश्वरूपत्वे हेतुपरो विश्वेश्वरशब्द इत्यभिप्रायेणाहविश्वस्य नियन्तरिति। व्याप्यनियन्ता हि शरीरी।नान्तं न मध्यम् इत्यादौ विद्यमानस्यादर्शनं न विवक्षितम् अर्जुनस्य दिव्यचक्षुर्लाभेन तदयोगात्? अन्यत्रअनन्तरूपम् इति हेतुगर्भविशेषणाद्विषयाभावादेव शशश्रृङ्गादेरिवादर्शनमुक्तमित्यभिप्रायेणाहयत इति। इदं चविश्वरूप इत्यनेनापि विवक्षितम्। अत्र देशतः कालतश्चादिमध्यान्तनिषेधो भाव्यः। आद्यन्तरूपावच्छेदाभावात्तदुभयनिरूपणीयमध्याभावोऽपि सिद्धः।

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vedic-scriptures · BG11.16
English translation witness
telang-1882 · Chapter 11; aligned against BG11.16
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